वह कहता था, वह सुनती थी, जारी था एक खेल कहने-सुनने का। खेल में थी दो पर्चियाँ। एक में लिखा था *‘कहो’*, एक में लिखा था *‘सुनो’*। अब यह नियति थी या महज़ संयोग? उसके हाथ लगती रही वही पर्ची जिस पर लिखा था *‘सुनो’*। वह सुनती रही। उसने सुने आदेश। उसने सुने उपदेश। बन्दिशें उसके लिए थीं। उसके लिए थीं वर्जनाएँ। वह जानती थी, ‘कहना-सुनना’ नहीं हैं केवल क्रियाएं। राजा ने कहा, ‘ज़हर पियो’ *वह मीरा हो गई।* ऋषि ने कहा, ‘पत्थर बनो’ *वह अहिल्या हो गई।* प्रभु ने कहा, ‘निकल जाओ’ *वह सीता हो गई।* चिता से निकली चीख, किन्हीं कानों ने नहीं सुनी। *वह सती हो गई।* घुटती रही उसकी फरियाद, अटके रहे शब्द, सिले रहे होंठ, रुन्धा रहा गला। उसके हाथ *कभी नहीं लगी वह पर्ची,* जिस पर लिखा था, *‘कहो’*।
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