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दिसंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एक साल ऐसा भी

*॰एक साल ऐसा भी -* ```ना अचारों की खुशबू,  ना बर्फ की चुस्की,  ना गन्ने का रस,  ना मटके की कुल्फी ॥```       *॰एक साल ऐसा भी..*       ```ना शादियों के कार्ड,         ना लिफाफों पर नाम,         ना तीये का उठावना,         ना दसवें की बैठक ॥``` *॰एक साल ऐसा भी..* ```ना साड़ी की खरीदारी,  ना मेकअप का सामान,  ना जूतों की फरमाइश, ना गहनों की लिस्ट ॥```       *॰एक साल ऐसा भी..*        ```ना ट्रेन की टिकट,          ना बस का किराया,         ना फ्लाइट की बुकिंग,         ना टैक्सी का भाड़ा ॥``` *॰एक साल ऐसा भी..* ```ना नानी का घर, ना मामा की मस्ती, ना मामी का प्यार,  ना नाना का दुलार ॥```        *॰एक साल ऐसा भी..*         ```ना पिता का आंगन,         ना माँ का स्वाद,         ना भाभी की मनुहार,  ...

चाय ठंडी मे-

इलाइची की महक ओढ़े  अदरक का श्रृंगार कर सजी थी केतली की दहलीज से निकल कर प्याली की डोली में बैठी थी  इस भागते हुए वक्त पर  कैसे लगाम लगाई जाए *ऐ ठंड ... आ बैठ * *तुझे एक कप चाय पिलाई जाए ☕*🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻☕

जिंदगी

जो कह दिया वह *शब्द* थे ; जो नहीं कह सके वो *अनुभूति* थी ।। और, जो कहना है मगर ; कह नहीं सकते, वो *मर्यादा* है ।। *जिंदगी* का क्या है ? आ कर *नहाया*, और, *नहाकर* चल दिए ।। *बात पर गौर करना*- ---- *पत्तों* सी होती है कई *रिश्तों की उम्र*, आज *हरे*-------! कल *सूखे* -------! क्यों न हम, *जड़ों* से; रिश्ते निभाना सीखें ।। रिश्तों को निभाने के लिए, कभी *अंधा*, कभी *गूँगा*, और कभी *बहरा* ; होना ही पड़ता है ।। *बरसात* गिरी और *कानों* में इतना कह गई कि---------! *गर्मी* हमेशा किसी की भी नहीं रहती ।। *नसीहत*, *नर्म लहजे* में ही अच्छी लगती है । क्योंकि, *दस्तक का मकसद*, *दरवाजा* खुलवाना होता है; तोड़ना नहीं ।। *घमंड*-----------! किसी का भी नहीं रहा, *टूटने से पहले* , *गुल्लक* को भी लगता है कि ; *सारे पैसे उसी के हैं* । जिस बात पर , कोई *मुस्कुरा* दे; बात --------! बस वही *खूबसूरत* है ।। थमती नहीं, *जिंदगी* कभी, किसी के बिना ।। मगर, यह *गुजरती* भी नहीं, अपनों के बिना....!!!

Stroke -You must know

  Stroke A stroke may cause loss of body balance and/or unconsciousness, which may result in a fall. Signs of stroke ·          Numbness in the face,arm or leg,especially on one side of the body. ·          Confusion, trouble in speaking. ·          Trouble in walking ,loss of balance,lack of coordination. ·          Severe headache. If you think you or someone around you may be having a stroke, follow these steps as first aid : First aid for strokes ·          Call emergency services. ·          Lying on one side with patient’s head slightly raised and supported in case they vomit. ·           loosen any constrictive clothing, such as a tie or scarf. ·     ...

आहिस्ता चल जिंदगी

आहिस्ता  चल  जिंदगी,अभी  कई  कर्ज  चुकाना  बाकी  है  कुछ  दर्द  मिटाना   बाकी  है  कुछ   फर्ज निभाना  बाकी है                     रफ़्तार  में तेरे  चलने से                     कुछ रूठ गए कुछ छूट गए                     रूठों को मनाना बाकी है                     रोतों को हँसाना बाकी है  कुछ रिश्ते बनकर ,टूट गए  कुछ जुड़ते -जुड़ते छूट गए  उन टूटे -छूटे रिश्तों के  जख्मों को मिटाना बाकी है                      कुछ हसरतें अभी  अधूरी हैं                      कुछ काम भी और जरूरी हैं                    ...

सृमद्धि जन्म सिद्ध अधिकार है-

 प्रकृति मे जो भी चीज़े है वो सुन्दर लगते है। बहती नदी ,झरना ,नाचता हुआ मोर पर भी ये लागु होता है।  दुनिया मे हम सब एक मकसद से आते है। मकसद पाकर सृमद्धि के शिखर को छू सकते है या मकसद से भटक जाते है। मनुष्य की प्रतिभा ही मकसद तक पहुँचाती है। ये प्रतिभा मनुष्य मे छिपी रहती है। ये बेसिक प्रतिभा आप को कोई दे नहीं सकता है और न ही कोई छीन सकता है। माता पिता का काम है इस प्रतिभा को पहचानना और बाहर निकालना।  जिस चीज़ को करने मे मज़ा आता है और वो करने मे समय का पता नहीं चलता है ,उसमे आनंद आता है वही उसकी प्रतिभा है। वही उसके जीवन का मकसद है।  कोई मनुष्य आता है संगीत की प्रतिभा लेकर और घर वाले उसे बना देते है कुछ और ।  असंतोष इस बात का सबूत है की आप अपने क्षेत्र मे नहीं है।  आप कर्म मे डूब जाये तो वही प्रतिभा है। 

ज़िन्दगी कशमकश के अजीब दौर से गुज़र रही है-

  *ज़िन्दगी कशमकश के*    *अजीब दौर से*    *फिर गुज़र रही हैं,*    *यह Mid fifty/sixty भी*    *कुछ Teenage सी*    *लग रही रही हैं।*    *हार्मोनल लहरों ने*    *जवानी की दहलीज़ पर*    *ला पटका था,*    *उफ़ ! तन और मन कैसे*    *उन मनोस्तिथियों से*    *निपटा था !*    *जल्दी बड़े दिखने की*    *चाहत में कितने*    *जतन करते थे,*    *अब बड़े न दिखे,*    *की चाहत में*    *कितने जतन करते हैं !*    *तब भी सुना था*    *बड़े हो चले हो,*    *अब थोड़ा ढंग से*     *पेश आया करो,*    *अब सुनता हूँ,*    *पचपन के हो चले हो,*    *कुछ तो शर्म खाया करो!*    *अब कम्बख़्त, जवानी भी*    *अलविदा कह*    *जान छुड़ाना चाहती हैं,*    *रँगे बालों की जाती रंगत,*    *रह रह कर बदहवासी*    *आईने में दिखाती हैं !*   ...