कविता
आज बहुत दिनों बाद
मेरी बेटी घर आई,
अपनी नन्ही परी को संग लिए
खुशियों की रौशनी छा गई।
समझ न आया क्या खिलाऊँ,
कहाँ बिठाऊँ उस लाड़ली को,
आँखों में बसती मुस्कान उसकी
भर गई मन की हर खाली कोठरी को।
कुछ बातें मैंने कीं,
कुछ सवाल उसने पूछे,
हँसी, यादें, अपनापन
सब लम्हों में घुलते चले गए।
पल भर में समय फिसल गया,
वो आई… और चली भी गई,
आँगन सूना रह गया फिर
पर दिल में मिठास छोड़ गई।

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