ज़िंदगी का हर अनुभव
कुछ न कुछ सिखा जाता है,
कभी मुस्कान देकर,
तो कभी आँसू चुपचाप गिरा जाता है।
अकेलापन जब साथ निभाता है,
तब इंसान खुद को पहचान पाता है।
जो कमज़ोरी कभी डर बन जाती थी,
वही ताक़त बनकर राह दिखा जाती है।
सीखा मैंने—
कमज़ोरी को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना,
हालात चाहे जैसे भी हों,
खुद पर भरोसा कभी कम नहीं होने देना।
एक बार अगर मन ने ठान लिया,
तो किसी सहारे की ज़रूरत नहीं रहती।
इंसान इतना मज़बूत बन जाता है,
कि दूसरों की बातें असर ही नहीं करतीं।
अब जान लिया है मैंने—
ताक़त बाहर नहीं, भीतर ही बसती है,
और जो खुद से जीत जाता है,
उसी की ज़िंदगी सच में सँवरती है।
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