*औरत की बेफिक्र चाल,*
*धक्-सी लगती है किसी को,*
*औरत की हँसी,*
*बेपरवाह-सी लगती है किसी को,*
*औरत का नाचना,*
*बेशर्म होना-सा लगता है किसी को,*
*औरत का बेरोक-टोक, यहाँ -वहाँ, आना-जाना,*
*स्वछन्द -सा लगता है किसी को,*
*औरत का प्रेम करना*,
*निर्लज्ज होना-सा लगता है किसी को,*
*औरत का सवाल करना,*
*हुकूमत के खिलाफ-सा लगता है किसी को!!*
*औरत,*
*तू समझती है न यह जाल!!*
〰➿➰➿〰
*लेकिन...,*
*औरत...,*
*तू चल अपनी चाल,*
*कि,नदी भी बहने लगे,*
*तेरे साथ-साथ!*
*तू ठठाकर हँस,*
*कि, बच्चे भी खिलखिलाने लगें,*
*तेरे साथ-साथ!*
*तू नाच,*
*कि, पेड़ भी झूमने लगें,*
*तेरे साथ-साथ!*
*तू नाप,धरती का कोना-कोना,*
*कि, दुनिया का नक्शा उतर आए,*
*तेरी हथेली पर!*
*तू कर प्रेम,*
*कि,अब लोग प्रेम करना भूलते जा रहे हैं!*
*तू कर हर वो सवाल,*
*जो तेरी आत्मा से बाहर निकलने को,*
*धक्का मार रहा हो!*
*तू उठा कलम,*
*और कर हस्ताक्षर...*
*अपने चरित्र प्रमाण पत्र पर,*
*कि, तेरे चरित्र प्रमाण पत्र पर,*
*अब किसी और के हस्ताक्षर,*
*अच्छे नहीं लगते.!!*
🍁🍁🍁
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