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नवंबर, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ध्यान देने योग्य बात -

 फल हमेशा खाना खाने के पहले खाना चाहिए। क्योकि फलो का पाचन जल्दी हो जाता है ,पकाये हुए भोजन की तुलना मे।  अगर आप भोजन के बीच मे फल खाते या अंत मे खाते है तब हमारी intestine मे फल तब तक पड़ा रहेगा जब तक भोजन का पाचन नहीं हो जाता है। तब तक फल अंदर spoil हो जाता है ,उसमे से दुर्गन्ध आने लगती और गैस बन जाता है।  केवल फल ही नहीं फलो का रस भी भोजन के पहले पी लेना चाहिए।  स्वास्थ्यकारक भोजन कब और कैसे करे इसका भी असर हमारे स्वास्थय पर  पड़ता है। 

कोविद १९ के बाद की दुनिया -

 महामारी के बाद की ज़िंदगी पहले जैसी सामान्य नहीं होगी। इंसान ही इंसान से मिलने से कतराएगा।  हमारी ज़िंदगी के विभिन्न क्षेत्रों मे इसका असर दिखाई देगा।   ऑनलाइन लर्निंग ,टेलीफोन से दवाईया लेना ,ऑनलाइन मार्केटिंग ,ऑनलाइन कंसल्टेंसी आदि आदि।  मेरे ख्याल से समाज मे होने वाला एक बड़ा बदलाव हमारी सुरक्षा के लिए आवश्यक है।  हमारा भविष्य एक चिंताजनक बन गया है। इसकी एक क्लियर पिक्चर नहीं दिखाई दे रही है।  मित्रो आप भी इस बारे मे अपनी राय दे। 

अमृत भोजन -

 हमारा शरीर ५ तत्वों से मिलकर बना है।  क्या आप जानते है की एक ऐसा भी भोजन है जो इन ५ तत्वों की पूर्ती करेगा? जी हा और वो चीज़ है अमृत भोजन।  यह आप अपने घर पर ही सहज तरीके से बना सकते है।  इसमे सभी पांचो चीज़े छिलके वाली होगी - काला चना ,मूंग ,मसूर,मोठ,मूंगफली - इन पांचो छिलके वाली चीज़ो को समान मात्रा मे मिला कर धो कर रात भर भिगो कर रख दे फिर उसे अंकुरित करे।  रोज़ आप थोड़ी थोड़ी मात्रा मे ये ले कर टमाटर ,खीरा काट कर उसके साथ सेंधा नमक,चाट मसाला ,काली मिर्च पाउडर डाल कर सुबह नाश्ते मे खाये।  ये एक स्वस्थ्य वर्धक नाश्ता होगा। 

खतरनाक दाल -

केसरी दाल जो हूबहू अरहर दाल से मिलती जुलती है लोग खरीद लेते है क्योकि ये अरहर दाल से कुछ सस्ती होती है।  दक्षिण भारत मे अरहर दाल खाने का कुछ ज़्यादा ही प्रचलन है। एक समान दिखने  से लोग अरहर के बदले मे केसरी दाल खरीद लेते है। मगर आम जनता ये नहीं जानती की केसरी दाल से हाथ पैर की आकृति बिगड़ जाती है और लकवा भी हो सकता है।  बंगाल मे इसे खेसारी दाल भी कहते है।  इसलिए अब की बार अरहर दाल खरीदते समय ध्यान रखे। 

क्या आप जानते है ?

 दोस्तों क्या आप जानते है की पहले से काट कर रखे गए फल और फलो का रस कितना हमारे शरीर के लिए घातक हो सकता है ? मंदिरो और घरो मे अक्सर कटे हुए फलो का प्रसाद दिया जाता है जो काफी समय पहले से कटा हुआ रखा रहता है।  इसके पीछे व्यग्यनिक कारण ये है की फलो का फेरस ऑक्साइड कुछ समय बाद ऑक्सीजन के संपर्क मे आकर फेरिक ऑक्साइड मे बदल जाता है ,जो एक स्लो पाइजन का काम करता है। फलसवरूप अपचन ,गैस की समस्या का सामना करना पड़ सकता है।  इसलिए उचित तो यही है की जब हमे कोई फल खाना हो,तभी उसे काटा जाना चाहिए। 

तुमने कभी पूछा नहीं

तुमने कभी पूछा नहीं  पर बता दूँ,,, मुझे पसंद है  .... साँझ ढले यूँही झाँकना खिड़की से  और दूर क्षितिज को निहारना ...... वो मेरी पुरानी सी डायरी  "अमृता" और "फ़राज़" की शायरी ..... सौँधी सी मिट्टी की महक  बारिश की बूँदोँ की खनक  ...... रोमाँटिक सँगीत सुनना बेधड़क यूँही कभी थिरकना ...... थाम कर तुम्हारा हाथ,,,  उँगलियाँ में उँगलियाँ उलझाना  और बस यूँही प्यार भरी  अठखेलियाँ करना  ...... हो कोई इक पल ऐसा कि  हम ख़ामोश रहेँ उँगलियाँ हाथों की बातें करती रहें  उलझनेँ ज़िंदगी की यूँही सुलझती रहें  .......

कोविद १९ ने सीखा दिया -

 जाने अनजाने इस कोविद १९ ने सारे विश्व को बहुत कुछ सीखा दिया है -  पैसा कमाने मे हमने परिवार,मित्र और समाज के प्रति कर्त्तव्य को भुला दिया था।  अपने रिश्तो को अहमियत दे। मुसीबत के  समय हमारा परिवार ही काम आता है।  अपने व्यस्त जीवन मे जो कार्य हम बरसो से टाल रहे थे उनको करने का हमे वक़्त मिला। हम अपने आप को समय देने लगे।  अपने शौक को पूरा करने का हमे भरपूर समय मिला।  किसी ने क्या खूब कहा है - "बेकार आदमी कुछ किया कर, कपड़े उधेड़ कर सिया कर"

जागरूक रहे

 आज की भागमभाग ज़िन्दगी मे लोगो के  पास इतना समय नहीं होता की अपने अचेतन मन की आवाज़ सुने।  अगर आप आध्यात्म से जुड़े रहेंगे,नियमित ध्यान और योग करेंगे तब आपको अपने आत्मा की आवाज़ सुनाई देगी। प्रकृति  के साथ तालमेल मे रहे। हमने वो जागरूकता खो दिया है।  जो व्यक्ति जागरूक रहता है उसे अपने अचेतन मन की आवाज़ सुनाई देती है ,उसके निर्देशों का पालन करने पर कार्यो मे सफलता मिलती है।   

अतीत मे जीना -

 हम मे से बहुत से लोग ऐसे है जो अतीत मे ही जीते रहते है। पुराने दिनों को वो लोग भूल नहीं पाते है और वर्तमान मे सुख शांति का अनुभव नहीं कर पाते है। भूतकाल के  जीवन को ही वो सदियों तक अपने सीने से लगाए रखते है जो उचित नहीं है।  ये सही है की हमारी बीती हुई घटनाये अच्छी भी होती है उनको याद कर हमे ख़ुशी मिलती है मगर इसका मतलब ये नहीं की हमेशा अपने दुखो का रोना रोया जाये।  अतीत मे जीने वाले लोग वर्तमान मे खुश नहीं रहते है। उन्हें हमेशा अपने वालो से शिकायत होती है।  अपने जीवन से नकारात्मक बातो और घटनाओ को मिटा दे और वर्तमान को अपना ले। अपने आप को बदलते परिवेश के साथ ढाल ले। यही सफलता का मंत्र है।  अतीत इतिहास बन चूका है। वो अनुभव लेने के लिए है। भविष्य अनिश्चित है जो दिखाई नहीं देता है।  वर्तमान ही जीवन है जो सामने है और दिख रहा है। 

अस्वास्थ्कर भोजन -

 हमारे रोज़ के खाने मे हमे ध्यान रखना चाहिए की कही कोई विपरीत भोजन तो हम नहीं कर रहे है?  हम मे से ज़्यादातर लोग ऐसे है जो ये नहीं जानते की विपरीत भोजन खाने से कितना घातक परिणाम हो सकता है।  जैसे दूध और दही कभी भी एक साथ नहीं खाना चाहिए। लोग खीर और रायता दोनों एक ही समय खा लेते है। दूध के साथ मछली ,दूध और फल ,दूध और नमक ये सभी विपरीत चीज़े है जिसके खाने से शरीर मे धीमा ज़हर पैदा होता है और उससे अपचन ,दस्त ,उलटी ही नहीं लिवर की बीमारी का खतरा भी निश्चित है। 

मुस्कराओ और दुनिया जीतो -

 मुस्कराओ और दुनिया  जीतो - आज की व्यस्तम ज़िंदगी मे लोग मुस्कराना भूल गए है। अपने चारो और नकारात्मक ऊर्जा को ले कर जी रहे है। ज़ोर से बात करना ,क्रोध करना कितना ज़्यादा स्वस्थ्य के  लिए हानिकारक है ये सब जान कर भी लोग अनजान हो गए है। इंसान को जितनी भी बड़ी बड़ी बीमारिया होती है वो चिल्लाने और  क्रोध करने से होती है। जब धीरे बात करने से काम चल जाता है तो ज़ोर से बात करने की क्या ज़रूरत? आपके ज़रा से मुस्कराने से चारो और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है,वातावरण मे खुशहाली आती है और लोग आपके मित्र बनने लगते है।  इसे अभी से आज़मा कर देखे। ये सफलता की कुंजी है। 

पता ही नहीं चला

 एक विचार, आज यू ही समय चला , पर कैसे चला,  पता ही नहीं चला ,   ज़िन्दगी की आपाधापी में , कब निकली उम्र हमारी यारो , पता ही नहीं चला , कंधे पर चढ़ने वाले बच्चे ,         कब कंधे तक आ गए , पता ही नहीं चला , किराये के घर से शुरू हुआ था सफर अपना ,   कब अपने घर तक आ गए , पता ही नहीं चला , साइकिल के पैडल मारते हुए    हांफते थे उस वक़्त,  कब से हम कारों में घूमने लगे हैं , पता ही नहीं चला , कभी थे जिम्मेदारी हम माँ बाप की , कब बच्चों के लिए हुए जिम्मेदार हम , पता ही नहीं चला , एक दौर था जब दिन में भी              बेखबर सो जाते थे , कब रातों की उड़ गई नींद , पता ही नहीं चला , जिन काले घने बालों पर       इतराते थे कभी हम , कब सफेद होना शुरू हो गए पता ही नहीं चला , दर दर भटके थे नौकरी की खातिर ,         कब रिटायर हो गए  समय  का , बच्चों के लिए कमाने बचाने में                           इत...

देर न हो जाये कही देर न हो जाये

  मेरे प्रिय मित्रो,  आज की प्रदूषित वातावरण से अपने आप को बचाये- व्यस्त रहे मस्त रहे. मैं  अभी अभी हिंदी लिखने की कोशिश कर रही हु । कोशिश करने वालो की हार नहीं होती है,सच कहा न? हम सब के लिए खुश खबरी - अब वो वक़्त आ गया है जब हम अपनी मातृभाषा को महत्वा दे। चलो एक कदम हिंदी की तरफ बराये ,कुछ नया करे। किसी ने सच ही कहा है - देर आये दुरुस्त होय / तो क्यों न ये शुभ काम आज और अभी से शुरू किया जाये?