तुमने कभी पूछा नहीं
पर बता दूँ,,, मुझे पसंद है
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साँझ ढले यूँही झाँकना खिड़की से
और दूर क्षितिज को निहारना
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वो मेरी पुरानी सी डायरी
"अमृता" और "फ़राज़" की शायरी
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सौँधी सी मिट्टी की महक
बारिश की बूँदोँ की खनक
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रोमाँटिक सँगीत सुनना
बेधड़क यूँही कभी थिरकना
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थाम कर तुम्हारा हाथ,,,
उँगलियाँ में उँगलियाँ उलझाना
और बस यूँही प्यार भरी
अठखेलियाँ करना
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हो कोई इक पल ऐसा कि
हम ख़ामोश रहेँ
उँगलियाँ हाथों की बातें करती रहें
उलझनेँ ज़िंदगी की यूँही सुलझती रहें
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