सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Ladies Mobile Poem

"ये मोबाइल हमारा है
                      पतिदेव से भी प्यारा है"

उठते ही मोबाइल के दर्शन पहले पाऊ मै।
                          पति परमेशवर को ऐसे में बस भूल ही जाऊ मै।

मध्यम आंच पर चाय चड़ाऊ मै।
                         वोट्सअप को पढती जाऊ मै।

चाय उबल कर हो गई काडा।
                       चिल्ला रहे है पति देव हमारा।

कानो में है ईयरफ़ोन लगाया।
                       अब मैने फेसबुक है चलाया।

रोटी बनाने कि बारी आई।
                       दाल गैस पर चढा कर आई।

इतने में सखी का फ़ोन आया।
                      पार्टी का उसने संदेशा सुनाया।

करने लगी बाते मैं प्यारी।
                      इतने में भिन्डी हो गई करारी।

सासूजी चबा ना पाई।
                    मन ही मन वो खूब बडबड़ाई।

ससुर जी बैठे है बाथरूम में।
                   खत्म हो गया पानी टंकी में।

कैंडी-कृश गेम में उलझ गई थी मैं।
                    मोटर चालु करना ही भूल गई थी मैं।

ग्रुप कि एडमिन बन कर है नाम बहुत कमाया।
                   सबके घर की बहुओ को अपने ही साथ उलझाया।

बच्चो की मार्कशीट के मार्क्स ही ऐसे आए।
               जो पति परमेश्वर के दिल को ना है भाए।

उसे देख पतिदेव ने सिंघम रूप बनाया।
            "आता माझी सटकली" हमको है सुनाया

घर का बजा रहा है बाराह।
           ऐसा है मोबाइल हमारा।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

अनुभवों का सागर: जब बुजुर्ग साझा करें अपनी बातें

  "आजकल के डिजिटल समूहों में, जब बड़े-बुजुर्ग 'गुड मॉर्निंग' जैसे संदेश भेजते हैं, तो अक्सर उन्हें मना किया जाता है। पर क्या यह सचमुच कोई बुरी बात है? उनकी ज़िंदगी के अनुभवों, उनके विचारों को सुनने वाला उनके पास कोई नहीं होता। ऐसे में, जब वे अपनी बातें समूह में साझा करते हैं, तो इसमें हर्ज ही क्या है? यह केवल एक संदेश नहीं, बल्कि उनके अकेलेपन को दूर करने और समाज से जुड़े रहने का एक छोटा सा प्रयास होता है। हमें उनके इस प्रयास को समझना चाहिए और उन्हें अपने विचारों को व्यक्त करने का अवसर देना चाहिए, क्योंकि उनके पास ज्ञान और अनुभव का खजाना है जो अक्सर अनसुना रह जाता है।"

“आई थी बिटिया, छोड़ गई खुशबू”

  कविता आज बहुत दिनों बाद मेरी बेटी घर आई, अपनी नन्ही परी को संग लिए खुशियों की रौशनी छा गई। समझ न आया क्या खिलाऊँ, कहाँ बिठाऊँ उस लाड़ली को, आँखों में बसती मुस्कान उसकी भर गई मन की हर खाली कोठरी को। कुछ बातें मैंने कीं, कुछ सवाल उसने पूछे, हँसी, यादें, अपनापन सब लम्हों में घुलते चले गए। पल भर में समय फिसल गया, वो आई… और चली भी गई, आँगन सूना रह गया फिर पर दिल में मिठास छोड़ गई।

प्रकृति ने भी क्या अजीब खेल खेला -

 प्रकृति ने भी क्या अजीब खेल खेला - जो न देते थे जवाब उनके सलाम आने लगे... वक्त बदला तो मेरे नीम पर आम आने लगे.... यह सिर्फ कहने के लिए ही नहीं है। कोविद के समय वातावरण और पेड़ पोधो मे बदलाव देखने को मिला। मेरे बालकनी गार्डन के गमले मे आम के पौधे मे दिसंबर की कड़ाके की ठण्ड मे आम निकलते हुए देख कर आश्चर्य मे पड़ गई। प्रकृति ने भी क्या नया रूप दिखाया।  वाह